रफ़्तार से दौड़ती झिन्दगी मै
रफ़्तार से दौड़ती झिन्दगी मै दो पल खुद के लिए रुकना झरूरी है,
रफ़्तार से दौड़ती झिन्दगी मै दो पल अपनों के लिए रुकना झरूरी है,
क्या पता किस वक्त खुदा लगा दे ब्रेक इस झिन्दगी की गाडी की,
साँसे रुक जाए उससे पहेले अपनों से मिल लेना झरूरी है.
संजय जोषी (अंजान)
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