Saturday, August 11, 2012

पनाह देता है




फूल के जैसी झिंदगी है यारो अपनी, 

जिसे हर कोई पनाह देता है यहाँ, 

प्यार से कोई आँखों मै तो कोई दिल में गुलिस्ता बना लेता है, 

प्यार मै टुटा हुआ हमें किताबो मै पनाह देता है, 

तो नफरत की आग मै जला अपने पैरों तले कुचल देता है,

पर किसी ना किसी तराह हमें तो पनाह देता है.



संजय जोषी (अंजान)

No comments:

Post a Comment